Body Image को आकार देने में मीडिया की भूमिका

फिल्मों, टीवी विज्ञापनों, सोशल मीडिया और फैशन इंडस्ट्री में दिखाई जाने वाली तस्वीरें अक्सर यह तय करने में मदद करती हैं कि लोग किस तरह के शरीर को आकर्षक या आदर्श मानने लगते हैं।

आज के डिजिटल दौर में Body Image यानी व्यक्ति अपने शरीर और शारीरिक बनावट को किस नजरिए से देखता है, यह केवल व्यक्तिगत सोच तक सीमित नहीं है।

परिवार, समाज और आसपास के लोगों के साथ-साथ मीडिया भी हमारी बॉडी इमेज को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभाता है। फिल्मों, टीवी विज्ञापनों, सोशल मीडिया और फैशन इंडस्ट्री में दिखाई जाने वाली तस्वीरें अक्सर यह तय करने में मदद करती हैं कि लोग किस तरह के शरीर को आकर्षक या आदर्श मानने लगते हैं।

मीडिया कैसे बनाता है शरीर की आदर्श छवि?

मीडिया में अक्सर ऐसे मॉडल, अभिनेता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर दिखाई देते हैं जिनकी शारीरिक बनावट एक खास तरह के सौंदर्य मानकों के अनुरूप होती है।

परफेक्ट स्किन, फिट बॉडी, पतली कमर या मस्कुलर शरीर को सफलता और आकर्षण से जोड़कर पेश किया जाता है। लगातार ऐसी तस्वीरें देखने से लोगों को लग सकता है कि अच्छा दिखने के लिए उन्हें भी उसी तरह का शरीर हासिल करना जरूरी है।

हालांकि, मीडिया में दिखाई जाने वाली तस्वीरें हमेशा वास्तविक नहीं होतीं। मेकअप, कैमरा एंगल, लाइटिंग और फोटो एडिटिंग जैसी तकनीकों से किसी व्यक्ति की वास्तविक उपस्थिति काफी अलग दिखाई जा सकती है। इसके बावजूद कई लोग इन तस्वीरों की तुलना अपने वास्तविक शरीर से करने लगते हैं।

सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव

सोशल मीडिया ने Body Image पर मीडिया के प्रभाव को और बढ़ा दिया है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म पर लोग अपनी जिंदगी और शरीर की चुनिंदा तस्वीरें साझा करते हैं। फिल्टर और एडिटिंग के इस्तेमाल से तस्वीरों को और आकर्षक बनाया जा सकता है।

ऐसी तस्वीरों को बार-बार देखने से खासकर युवा अपने शरीर को लेकर असंतुष्ट महसूस कर सकते हैं। लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स की संख्या भी कई बार व्यक्ति के आत्मविश्वास को प्रभावित करती है।

जब किसी को लगता है कि उसका शरीर सोशल मीडिया पर दिखने वाले तथाकथित ‘परफेक्ट’ शरीर जैसा नहीं है, तो उसमें हीन भावना पैदा हो सकती है।

Body image: समाज के मानकों का प्रतिबिंब

Body Image और मानसिक स्वास्थ्य

नकारात्मक Body Image का असर केवल बाहरी रूप-रंग तक सीमित नहीं रहता। अपने शरीर को लेकर लगातार असंतोष तनाव, कम आत्मविश्वास और सामाजिक परिस्थितियों से बचने जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है।

कुछ लोग अपने वजन या शरीर के आकार को लेकर अत्यधिक चिंता करने लगते हैं और खाने या व्यायाम से जुड़ी अस्वस्थ आदतें भी विकसित कर सकते हैं।

इसलिए यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की पहचान और उसकी योग्यता केवल उसके शरीर या रूप-रंग से तय नहीं होती। स्वस्थ शरीर और सकारात्मक आत्म-छवि का मतलब किसी एक खास आकार या वजन को हासिल करना नहीं है।

सकारात्मक बदलाव की जरूरत

मीडिया समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम भी बन सकता है। अलग-अलग उम्र, आकार, रंग और शारीरिक बनावट वाले लोगों को प्रतिनिधित्व देने से सुंदरता की सीमित परिभाषा को बदला जा सकता है।

विज्ञापनों और मनोरंजन सामग्री में वास्तविक और विविध शरीरों को जगह मिलने से लोगों पर अवास्तविक सौंदर्य मानकों का दबाव कम हो सकता है।

इसके साथ ही मीडिया साक्षरता भी जरूरी है। लोगों को यह समझना चाहिए कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर तस्वीर वास्तविक जीवन का सटीक प्रतिबिंब नहीं होती।

किसी भी तस्वीर या वीडियो को देखने के बाद खुद की तुलना उससे करने के बजाय उसके पीछे मौजूद एडिटिंग, प्रस्तुति और व्यावसायिक उद्देश्य को समझना अधिक उपयोगी है।

अन्य ख़बरों के लिए यहाँ क्लिक करें

Related Articles

Back to top button