CJI Surya Kant बोले- भारत में सदियों से प्रकृति के प्रति रही है श्रद्धा

CJI सूर्य कांत ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से इस बात की वकालत की है कि पर्यावरण को बचाए बिना की गई तरक्की सिर्फ़ एक मृगतृष्णा (धोखा) है, जो पर्यावरण के विनाश के रेगिस्तान में गायब हो जाती है।"

भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI Surya Kant ने कहा कि धरती को बचाने का विचार भारत की विरासत में गहराई से बसा हुआ है और प्रकृति के प्रति देश का पुराना सम्मान संविधान में भी झलकता है।

दिल्ली में “पर्यावरण और जलवायु की गतिशीलता का भविष्य” (The Future of Environment and Climate Dynamics) विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए, CJI Surya Kant ने कहा कि संविधान “सिर्फ़ एक राजनीतिक दस्तावेज़” नहीं है, बल्कि “बीती, मौजूदा और आने वाली पीढ़ियों के साथ एक नैतिक समझौता” है।

CJI Surya Kant ने प्रकृति पर कही बात

CJI Surya Kant ने कहा, “सभ्यता की शुरुआत से ही भारत में प्रकृति माता के प्रति अटूट सम्मान रहा है। पर्यावरण की जीवंत विविधता के प्रति इस गहरे सम्मान की झलक हमारे गणतंत्र के मूल दस्तावेज़ में भी मिलती है।”

संवैधानिक ढांचे का ज़िक्र करते हुए, CJI ने कहा कि अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करने का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 51A(g) हर नागरिक से प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करने के लिए कहता है।

उन्होंने कहा कि संवैधानिक प्रावधान तो बस शुरुआत हैं और उन्हें सार्थक सुरक्षा उपायों में बदलने के लिए न्यायिक व्याख्या की ज़रूरत होती है। CJI सूर्य कांत ने कहा, “फिर भी, संविधान के शब्द तो बस बीज की तरह हैं। उन्हें जीवन में बदलने के लिए न्यायिक समझदारी के पोषण वाले पानी की ज़रूरत होती है।”

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को “पर्यावरण न्याय का बरगद का पेड़” बताया और कहा कि पर्यावरण से जुड़े इसके कानूनी सिद्धांत भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत सोच पर आधारित हैं और इनका मकसद आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करना रहा है।

CJI ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से पर्यावरण से जुड़े कानूनों और सिद्धांतों को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है और ऐसे सिद्धांत बनाए हैं जिनका मकसद विकास और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना है।

उन्होंने कहा कि कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ के हिस्से के तौर पर ‘स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार’ को मान्यता दी है और कई अहम सिद्धांत विकसित किए हैं, जिनमें ‘एहतियाती सिद्धांत’ (precautionary principle), ‘प्रदूषण फैलाने वाले की जिम्मेदारी’ (polluter pays principle), ‘पूर्ण दायित्व’ (absolute liability) और ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ (public trust doctrine) शामिल हैं।

CJI के अनुसार, इन सिद्धांतों ने अधिकारियों और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वालों पर यह ज़िम्मेदारी डाली कि वे नुकसान को रोकें, खराब हुए पर्यावरण को ठीक करें और जवाबदेही तय करें।

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CJI Surya Kant ने सतत विकास पर दिया जोर

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ (सतत विकास) का कॉन्सेप्ट भी विकसित किया है, ताकि यह पक्का किया जा सके कि विकास न तो पूरी तरह रुके और न ही पर्यावरण की ज़रूरी सुरक्षा के बिना आगे बढ़े।

CJI सूर्य कांत ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से इस बात की वकालत की है कि पर्यावरण को बचाए बिना की गई तरक्की सिर्फ़ एक मृगतृष्णा (धोखा) है, जो पर्यावरण के विनाश के रेगिस्तान में गायब हो जाती है।”

उन्होंने आगे कहा कि कोर्ट के फैसलों से यह बात साफ़ हुई है कि प्रकृति की रक्षा करना सिर्फ़ परोपकार का काम नहीं है, बल्कि यह खुद के अस्तित्व को बचाने और जीवन को बनाए रखने से भी जुड़ा है।

CJI की ये टिप्पणियाँ सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरण से जुड़ी लगातार जारी कानूनी समझ के संदर्भ में आई हैं, जिसमें आर्थिक और बुनियादी ढाँचे के विकास और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी संवैधानिक ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है।

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