Ganesh Chaturthi 2026: जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, महत्व और परंपराएं
यह पर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, गोवा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

हिंदू धर्म में Ganesh Chaturthi का विशेष धार्मिक महत्व है। भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि, सौभाग्य और विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है।
इस दिन श्रद्धालु भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। साल 2026 में गणेश चतुर्थी सोमवार, 14 सितंबर को मनाई जाएगी।
Ganesh Chaturthi के दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद कई दिनों तक पूजा, आरती और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
यह पर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, गोवा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
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Ganesh Chaturthi 2026 कब है?
पंचांग के अनुसार, 2026 में Ganesh Chaturthi 14 सितंबर, सोमवार को पड़ रही है। इस दिन भगवान गणेश की स्थापना और पूजा की जाती है। भक्त अपनी सुविधा और स्थानीय परंपराओं के अनुसार घर में गणेश प्रतिमा स्थापित कर सकते हैं। गणेश उत्सव के दौरान श्रद्धालु भगवान गणेश को मोदक, लड्डू और दूर्वा अर्पित करते हैं।
गणेश चतुर्थी के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन किया जाता है। हालांकि, कई परिवार अपनी परंपरा के अनुसार डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन या दस दिन बाद भी गणेश प्रतिमा का विसर्जन करते हैं।
Ganesh Chaturthi का धार्मिक महत्व
भगवान गणेश को हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करने की परंपरा है। मान्यता है कि गणेश जी की पूजा करने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने गणेश जी की रचना की थी और बाद में भगवान शिव ने उन्हें हाथी का सिर प्रदान किया। इसी कारण गणेश जी को गजानन, लंबोदर, एकदंत और विनायक जैसे कई नामों से भी जाना जाता है।
Ganesh Chaturthi पर कैसे करें पूजा?
गणेश चतुर्थी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनने के बाद पूजा स्थल की सफाई की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। प्रतिमा को फूल, दूर्वा, सिंदूर और अक्षत अर्पित किए जाते हैं।
भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाना विशेष शुभ माना जाता है। इसके बाद गणेश जी की आरती और मंत्रों का जाप किया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत भी रखते हैं।
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गणेश उत्सव की प्रमुख परंपराएं
गणेश चतुर्थी पर घरों के अलावा सार्वजनिक स्थानों पर भी बड़े-बड़े पंडाल लगाए जाते हैं। इन पंडालों में भगवान गणेश की आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। भक्त बड़ी संख्या में दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।
महाराष्ट्र में गणेश उत्सव विशेष रूप से भव्य तरीके से मनाया जाता है। ढोल-ताशे, भजन, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उत्सव का प्रमुख हिस्सा होते हैं। कई स्थानों पर सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
गणेश विसर्जन क्यों किया जाता है?
गणेश उत्सव के अंत में भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। भक्त श्रद्धा और भावनाओं के साथ गणपति बप्पा को विदाई देते हुए अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हैं। विसर्जन के दौरान “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” जैसे जयकारे लगाए जाते हैं।
गणेश विसर्जन जीवन में परिवर्तन और प्रकृति में विलय का प्रतीक भी माना जाता है। आजकल पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए लोग मिट्टी से बनी और प्राकृतिक रंगों वाली गणेश प्रतिमाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं।
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