Pawan Khera ने उठाई CEC के इस्तीफे की मांग, SIR को लेकर जताई चिंता
Pawan Khera ने सुझाव दिया कि सभी विपक्षी दल एकजुट हों और तब तक चुनावों में हिस्सा लेने से इनकार कर दें जब तक कि CEC और चुनाव आयुक्त इस्तीफ़ा न दे दें और उनकी जगह लेने वालों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज वाली समिति के ज़रिए न हो।

कांग्रेस नेता Pawan Khera ने मंगलवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व केंद्रीय गृह सचिव राज कुमार सिंह द्वारा मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) की आलोचना का ज़िक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया से चुनावी कानून, वोटर्स के अधिकार छिनने और चुनाव आयोग की आज़ादी को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।
‘X’ पर एक पोस्ट में Pawan Khera ने कहा कि सिंह “सिस्टम को अंदर से जानते हैं” और उन्होंने SIR की “कड़ी आलोचना” की है। Pawan Khera ने कहा, “उनकी चेतावनी सिर्फ़ मतदाता सूची की प्रक्रिया तक ही सीमित नहीं है।”
उन्होंने सिंह द्वारा उठाई गई चिंताओं को गिनाया, जिनमें शामिल हैं: सभी वयस्कों को वोट देने के अधिकार (यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइज़ी) को खतरा, चुनावी कानून और प्रक्रिया का उल्लंघन, चुनावी शक्तियों का केंद्रीकरण, प्राकृतिक न्याय से इनकार, युवा वोटर्स के लिए रुकावटें, तकनीकी मानदंडों का “गरीबों के खिलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल,” प्रवासियों और हाशिए पर रहने वाले नागरिकों पर बहुत ज़्यादा असर, और ECI की संस्थागत आज़ादी और राजनीतिक दखल पर सवाल।
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चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल
Pawan Khera ने कहा कि सिंह की चिंताओं को “सिर्फ़ पक्षपाती बयानबाजी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता” और आरोप लगाया कि “भारतीय चुनावों की निष्पक्षता खत्म हो गई है”।
उन्होंने आगे कहा कि चुनाव आयोग में जनता का भरोसा बहाल करने की दिशा में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा एक ज़रूरी पहला कदम था।
उन्होंने लिखा, “भारतीय चुनावों की निष्पक्षता खत्म हो गई है। और चुनाव आयोग में जनता का भरोसा बहाल करने की दिशा में ज्ञानेश कुमार गुप्ता का इस्तीफ़ा एक ज़रूरी पहला कदम है।”
Pawan Khera द्वारा शेयर किए गए अपने खुले पत्र में, आरके सिंह ने लिखा, “क्या आप चाहते हैं कि भारत एक लोकतंत्र बना रहे? तो आपको यह समझना होगा कि ज्ञानेश कुमार, CEC और उनके बॉस तथाकथित SIR में क्या कर रहे हैं। वे कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।”
सिंह ने कहा कि ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ की धारा 21 के तहत, विशेष संशोधन केवल खास मामलों में, लिखित कारणों के आधार पर और केवल किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से में ही किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “पूरे देश के लिए गहन संशोधन का आदेश गैर-कानूनी था। विशेष मामलों के लिए दी गई छूट नियम नहीं बन सकती।” उन्होंने आरोप लगाया कि नाम हटाने के खिलाफ अपील लंबित होने के बावजूद चुनावों में संशोधित मतदाता सूची (जिसमें से नाम हटाए गए थे) का इस्तेमाल किया गया।
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धारा 22 में नाम हटाने की प्रक्रिया
उन्होंने यह भी कहा कि धारा 22 के तहत, केवल ‘निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी’ ही नाम हटा सकता है, और वह भी जांच और सुनवाई का उचित मौका देने के बाद ही।
सिंह ने आरोप लगाया कि सबूत पेश करने की जिम्मेदारी को उल्टा कर दिया गया था; जिन लोगों के नाम हटाए गए थे, उन्हें ‘फॉर्म 6’ के जरिए नए सिरे से आवेदन करना पड़ा।
उन्होंने यह भी दावा किया कि ‘फॉर्म 6’ में जोड़े गए एक नए परिशिष्ट (जिसमें 2003 की मतदाता सूची में माता-पिता के नामों का सीरियल नंबर मांगा गया था) ने “सभी युवा मतदाताओं के पंजीकरण को रोक दिया।”
उन्होंने कहा कि “लॉजिकल डिसक्रेपेंसी” (तार्किक विसंगति) का नियम, जिसके तहत पिता और बच्चे के बीच 15 साल से कम के अंतर को चिह्नित किया गया था, उसने गरीबों को बहुत ज़्यादा संख्या में बाहर कर दिया।
Pawan Khera ने कहा, “बाहर किए गए लोगों में सबसे ज़्यादा संख्या गरीबों और वंचितों की है, जिनकी आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है।” सिंह ने आगे दावा किया कि SIR ने अब तक 13 करोड़ नाम हटा दिए हैं।
उन्होंने कहा, “2024 के चुनावों में NDA और INDIA के बीच अंतर सिर्फ़ 3% था। इसलिए नाम हटाने की इस प्रक्रिया का चुनावों पर बड़ा असर पड़ा है और आगे भी पड़ेगा।”
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Pawan Khera ने CEC के इस्तीफे की मांग की
Pawan Khera ने सुझाव दिया कि सभी विपक्षी दल एकजुट हों और तब तक चुनावों में हिस्सा लेने से इनकार कर दें जब तक कि CEC और चुनाव आयुक्त इस्तीफ़ा न दे दें और उनकी जगह लेने वालों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज वाली समिति के ज़रिए न हो।
उन्होंने EVM के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की भी मांग की। सिंह ने कहा, “आइए, अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट हों।” इसके अलावा, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने गृह मंत्रालय की अगुवाई वाली ‘जनसांख्यिकीय बदलावों पर उच्च-स्तरीय समिति’ को “साफ़ तौर पर खतरनाक एजेंडे” और “पहले से बनी पूर्वाग्रहपूर्ण सोच” वाली समिति बताया।
उन्होंने ‘X’ पर कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि इसकी रिपोर्ट पहले ही तैयार की जा चुकी है।” रमेश ने एक पत्रकार की पोस्ट शेयर की, जिसमें बताया गया था कि पैनल ने पिछले 15 सालों के जन्म और गाड़ी के रजिस्ट्रेशन, स्कूल में दाखिले और प्रॉपर्टी के लेन-देन से जुड़े धर्म-आधारित डेटा के साथ-साथ धार्मिक ढांचों की ज़िलेवार जानकारी और आधार, वोटर ID और राशन कार्ड रजिस्ट्रेशन में असामान्य बढ़ोतरी का ब्योरा मांगा है।
खबरों के मुताबिक, राज्य ज़्यादातर सवालों का जवाब नहीं दे पाए हैं क्योंकि ऐसा डेटा आम तौर पर धर्म के आधार पर नहीं रखा जाता है।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खोजी रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद और बढ़ गया।
इस रिपोर्ट में कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां जताई थीं।
इस बीच, चुनाव आयोग ने इस सुझाव को खारिज कर दिया है कि बताई गई आपत्तियां संस्थागत असहमति को दिखाती हैं। आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े फैसले “आयोग की सर्वसम्मति से” लिए गए थे।
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